Indira Ekadashi Vrat Katha In Hindi

Indira Ekadashi Vrat Katha
यह इंदिरा एकादशी का व्रत
आपके पापो से मुक्ति दिलाएँ साथ ही
इस लोक के सुख भोगते हुए
स्‍वर्ग की प्राप्‍ति कराये।
ॐ विष्णवे नम:
इंदिरा एकादशी की शुभकामना

इंदिरा एकादशी व्रत कथा

उद्देश्य :
पितरों का उद्धार होता है.

तिथि :
अश्चिन मास के कृष्‍ण पक्ष एकादशी

इंदिरा एकादशी का महत्‍व
पितृ पक्ष में पड़ने की वजह से इंदिरा एकादशी का विशेष महत्‍व है. पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार इंदिरा एकादशी का व्रत करने से एक करोड़ पितरों का उद्धार होता है और स्‍वयं के लिए स्‍वर्ग लोक का मार्ग प्रशस्‍त होता है. मान्‍यता है कि एकादशी के दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है.


इंदिरा एकादशी की पूजा विधि :
– इंदिरा एकादशी के दिन सुबह उठकर स्‍नान करें और स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण कर लें.
– अब व्रत का संल्‍प लेते हुए कहें, “मैं सार भोगों का त्याग कर निराहार एकादशी का व्रत करुंगा/करुंगी, हे प्रभु! मैं आपकी शरण में हूं आप मेरी रक्षा करें.”
– अब शालिग्राम को पंचामृत से स्‍नान कराकर वस्‍त्र पहनाएं.
– शालिग्राम की मूर्ति के सामने विधिपूर्वक श्राद्ध करें.
– अब धूप, दीप, गंध, पुष्प, नैवेद्य आदि से भगवान ऋषिकेश की पूजा करें.
– पात्र ब्राह्मण को फलाहारी भोजन कराएं और दक्षिणा देकर विदा करें.
– दिन भर व्रत करें और केवल एक ही बार भोजन ग्रहण करें.
– दोपहर के समय किसी पवित्र नदी में जाकर स्‍नान करें.
– पूरी रात जागरण करें और भजन गाएं.
– अगले दिन यानी कि द्वादश को सुबह भगवान की पूजा करें.
– फिर ब्राह्मण को भोजन कराकर उन्‍हें यथाशक्ति दान-दक्षिणा देकर विदा करें.
– अब अपने पूरे परिवार के साथ मौन रहकर खुद भी भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करें.

इंदिरा एकादशी व्रत कथा
पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार प्राचीनकाल में सतयुग के समय में महिष्मति नाम की एक नगरी में इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करते हुए शासन करता था. वह राजा पुत्र, पौत्र और धन आदि से संपन्न और विष्णु का परम भक्त था. एक दिन जब राजा सुखपूर्वक अपनी सभा में बैठा था तो आकाश मार्ग से महर्षि नारद उतरकर उसकी सभा में आए. राजा उन्हें देखते ही हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और विधिपूर्वक आसन व अर्घ्य दिया.
सुख से बैठकर मुनि ने राजा से पूछा, “हे राजन! आपके सातों अंग कुशलपूर्वक तो हैं? तुम्हारी बुद्धि धर्म में और तुम्हारा मन विष्णु भक्ति में तो रहता है?” देवर्षि नारद की ऐसी बातें सुनकर राजा ने कहा- “हे महर्षि! आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल है तथा मेरे यहां यज्ञ कर्मादि सुकृत हो रहे हैं. आप कृपा करके अपने आगमन का कारण कहिए.” तब ऋषि कहने लगे, “हे राजन! आप आश्चर्य देने वाले मेरे वचनों को सुनो.”
मैं एक समय ब्रह्मलोक से यमलोक को गया, वहां श्रद्धापूर्वक यमराज से पूजित होकर मैंने धर्मशील और सत्यवान धर्मराज की प्रशंसा की. उसी यमराज की सभा में महान ज्ञानी और धर्मात्मा तुम्हारे पिता को एकादशी का व्रत भंग होने के कारण देखा. उन्होंने संदेशा दिया सो मैं तुम्हें कहता हूं. उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म में कोई विघ्‍न हो जाने के कारण मैं यमराज के निकट रह रहा हूं, सो हे पुत्र यदि तुम आश्विन कृष्णा इंदिरा एकादशी का व्रत मेरे निमित्त करो तो मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है.”
इतना सुनकर राजा कहने लगा, “हे महर्षि! आप इस व्रत की विधि मुझसे कहिए.” नारदजी कहने लगे, “आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रात:काल श्रद्धापूर्वक स्नानादि से निवृत्त होकर पुन: दोपहर को नदी आदि में जाकर स्नान करें_ फिर श्रद्धापूर्वक पितरों का श्राद्ध करें और एक बार भोजन करें. प्रात:काल होने पर एकादशी के दिन दातून आदि करके स्नान करें, फिर व्रत के नियमों को भक्तिपूर्वक ग्रहण करते हुए प्रतिज्ञा करें कि “मैं आज संपूर्ण भोगों को त्याग कर निराहार एकादशी का व्रत करूंगा.”

This picture was submitted by Smita Haldankar.

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