Shani Stotra Paath Arth Aur Laabh Sahit

🌑 शनि स्तोत्र पाठ – अर्थ और लाभ सहित
Shani Stotra Paath Arth Aur Laabh Sahit शनि देव की उपासना का एक प्रभावशाली माध्यम है, जो जीवन में कर्म, अनुशासन और न्याय का महत्व समझाता है। शनि स्तोत्र का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को धैर्य, संतुलन और कठिन परिस्थितियों से उबरने की शक्ति मिलती है। इसके अर्थ और लाभ को समझकर किया गया जप जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है।

Shani Stotra Shlok Neelanjan Samabhasam

Download Image Shani Stotra Shlok Neelanjan Samabhasam


🔷
नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् ।
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम् ॥

भावार्थ:
जो नील वर्ण के हैं, सूर्यपुत्र और यमराज के अग्रज हैं,
छाया देवी और सूर्य से उत्पन्न हैं, उन शनैश्चर को मैं प्रणाम करता हूँ।

लाभ:
– शनि दोष और साढ़ेसाती का शमन
– धैर्य और सहनशक्ति की वृद्धि

Shani Mantra With MeaningDownload Image
🔷
सूर्यपुत्रो दीर्घदेहो विशालाक्षः शिवप्रियः ।
मन्दचारः प्रसन्नात्मा पीडां हरतु मे शनिः ॥

भावार्थ:
शनि देव सूर्यपुत्र, दीर्घकाय, विशाल नेत्रों वाले और शिवप्रिय हैं।
उनकी चाल भले मंद है, पर उनका स्वभाव प्रसन्न है। वे मेरी पीड़ाएँ दूर करें।

लाभ:
– ग्रहबाधा और मानसिक क्लेश से मुक्ति
– शिव भक्ति में प्रगाढ़ता

Shani Dev Shyamvarna Shanti Sandesh

Download Image Shani Dev Shyamvarna Shanti Sandesh


🔷
नमः कृष्णाय नीलाय शान्ताय च शनैश्चराय।
नमः कालाग्निरूपाय कृतान्ताय नमो नमः॥

भावार्थ:
श्यामवर्ण, नील कांति वाले, शांत स्वभाव के शनि देव को नमन।
जो कालाग्नि समान तेजस्वी हैं और कर्मफल के निर्णायक हैं, उन्हें बार-बार प्रणाम।

लाभ:
– क्रोध और भ्रम का नाश
– कर्म के प्रति सजगता
– मानसिक संतुलन और आत्मविश्वास में वृद्धि

Namaste Konasthaya Pingalaya Shani Stotra

Download Image Namaste Konasthaya Pingalaya Shani Stotra


🔷
नमस्ते कोणसंस्थाय पिङ्गलाय नमोऽस्तुते।
नमस्ते बभ्रुरूपाय कृष्णाय नमोऽस्तुते॥

अर्थ:
कोण स्थान में स्थित, पीले-भूरे नेत्रों वाले शनि को नमस्कार।
भूरे और कृष्ण वर्ण रूप में स्थित शनि को बार-बार नमन।
लाभ:
यह श्लोक कुंडली के अशुभ कोनों से होने वाले प्रभाव को शांत करता है।
विशेष रूप से मानसिक भ्रम और अस्थिरता में लाभ देता है।

Shani Dev Stotra Mantra Message

Download Image Shani Dev Stotra Mantra Message


🔷
नमस्ते रौद्रदेहाय नमस्ते चान्तकाय च।
नमस्ते यमसंज्ञाय नमस्ते सौरये विभो॥

अर्थ:
भयानक स्वरूप वाले, अंत करने वाले, यम के समान धर्मकारी।
हे सूर्यवंशी शनि! आपको मेरा नमन।
लाभ:
यह श्लोक अन्याय और अधर्म से रक्षा करता है।
कर्मों का सही फल मिलने की चेतना जाग्रत करता है।

🔷️
नमस्ते मन्दसंज्ञाय शनैश्वर नमोऽस्तुते।
प्रसादं कुरु देवेश दीनस्य प्रणतस्य च॥

अर्थ:
मंद गति से चलने वाले, शनि देव आपको नमस्कार।
हे देवेश्वर, इस दीन और शरणागत पर कृपा करें।
लाभ:
यह श्लोक विनम्रता और आत्मसमर्पण सिखाता है।
अहंकार कम होता है और ईश्वर की कृपा का अनुभव होता है।

🔷️
कोणस्थः पिङ्गलो बभ्रुः कृष्णो रौद्रोऽन्तको यमः।
सौरिः शनैश्चरो मन्दः पिप्पलादेन संस्तुतः॥

अर्थ:
कोण में स्थित, पिंगल, बभ्रु, कृष्ण, रौद्र, अंतक और यमस्वरूप।
सूर्यपुत्र, शनैश्चर, मंद गति वाले—जिनकी स्तुति पिप्पलाद ऋषि ने की।
लाभ:
शनि के दस प्रमुख स्वरूपों का स्मरण होता है।
यह पाठ शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के प्रभाव को संतुलित करता है।

🔷️
एतानि दश नामानि प्रातः उत्थाय यः पठेत्।
शनैश्चरकृता पीडा न कदाचिद् भविष्यति॥

अर्थ:
जो व्यक्ति प्रातः उठकर शनि के इन दस नामों का पाठ करता है,
उस पर शनि द्वारा दी गई पीड़ा कभी नहीं आती।
लाभ:
नियमित पाठ से शनि का भय समाप्त होता है।
कर्म सुधरते हैं, जीवन में स्थिरता और न्याय का अनुभव होता है।

This picture was submitted by Smita Haldankar.

Leave a comment