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🌼 षट्तिला एकादशी व्रत कथा एवं माहात्म्य
🗓 तिथि व महत्व
माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षट्तिला एकादशी कहा जाता है।
इस व्रत में तिल के छह प्रकार के प्रयोग — स्नान, उबटन, हवन, तर्पण, भोजन और दान — करने का विधान है।
इसी कारण इसका नाम “षट्तिला” पड़ा।
यह व्रत समस्त पापों का नाश करने वाला और विष्णुधाम की प्राप्ति कराने वाला माना गया है।
📖 विस्तृत कथा
दालभ्य ऋषि और पुलस्त्य ऋषि संवाद
एक समय दालभ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से प्रश्न किया —
“हे महाराज! मनुष्य ब्रह्महत्या, चोरी, व्यसन, ईर्ष्या जैसे पाप करते हैं, फिर भी नर्क को प्राप्त नहीं होते। ऐसा कौन-सा दान या पुण्य है जो इन पापों को नष्ट कर देता है? कृपया बताइए।”
तब पुलस्त्य मुनि बोले —
**“हे महाभाग! आपने बड़ा गूढ़ प्रश्न किया है। इसका रहस्य ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इंद्र तक को ज्ञात नहीं, परंतु मैं आपको बताता हूँ।
जब माघ मास आता है तब मनुष्य को शुद्ध रहकर इंद्रियों को वश में करना चाहिए।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष सबका त्याग करके भगवान का स्मरण करना चाहिए।
इस मास में विशेषतः तिल का प्रयोग श्रेष्ठ माना गया है।
तिल स्नान, तिल का उबटन, तिल का हवन, तिल का तर्पण, तिल का भोजन और तिल का दान —
ये तिल के छह प्रयोग (षट्तिला) हैं।
इन्हीं के कारण यह व्रत षट्तिला एकादशी कहलाता है।”**
भगवान विष्णु और नारदजी संवाद
एक बार नारदजी ने भगवान विष्णु से यही प्रश्न किया।
भगवान ने कहा —
**“हे नारद! मैं तुम्हें सत्य कथा सुनाता हूँ।
प्राचीनकाल में मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी।
वह अनेक व्रत किया करती थी, परंतु कभी देवताओं या ब्राह्मणों को अन्न का दान नहीं किया।
उसके व्रतों से उसका शरीर शुद्ध हो चुका था, अतः वह विष्णुलोक की अधिकारी थी, परंतु अन्नदान न करने से उसकी तृप्ति कठिन हो गई।
मैं भिखारी का रूप धारण कर उसके पास गया और भिक्षा माँगी।
उस ब्राह्मणी ने मिट्टी का एक ढेला मेरे भिक्षापात्र में डाल दिया।
इस दान से जब वह स्वर्ग में आई तो उसे सुंदर महल मिला, लेकिन उसमें अन्न का अभाव था।
तब वह घबराकर मेरे पास आई और बोली —
‘भगवन्! मैंने इतने व्रत किए परंतु मेरा घर अन्न से रहित क्यों है?’
मैंने कहा —
‘तुम्हें जब देवांगनाएँ देखने आएँ, तब उनसे षट्तिला एकादशी का माहात्म्य सुन लेना और उसके अनुसार व्रत करना।’
फिर देवांगनाएँ आईं। उसने द्वार नहीं खोला और पहले उनसे व्रत का माहात्म्य पूछा।
देवांगनाओं ने जब षट्तिला एकादशी का महत्व बताया तब उसने द्वार खोला।
इसके बाद ब्राह्मणी ने यह व्रत किया।
फलस्वरूप वह सुंदर व रूपवती हो गई और उसका महल अन्नादि सम्पत्ति से पूर्ण हो गया।”**
🙏 पूजन विधि
– प्रातः स्नान के समय तिल का प्रयोग करें।
– भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा करें।
– तिल, वस्त्र, अन्न और कलश का दान करें।
– रात्रि को जागरण करें और अगले दिन द्वादशी को व्रत का पारण करें।
✨ व्रत का फल व लाभ
– पापों का नाश
– दरिद्रता और दुर्भाग्य का अंत
– शरीर और मन की शुद्धि
– विष्णुधाम की प्राप्ति
🌸 निष्कर्ष
षट्तिला एकादशी व्रत केवल उपवास का नाम नहीं,
बल्कि दान, संयम और भगवान विष्णु की उपासना से जीवन को पवित्र और परलोक को उज्ज्वल बनाने का पावन अवसर है।
तिल के छः प्रयोग इस व्रत को और अधिक पुण्यदायी बनाते हैं।
षट्तिला एकादशी की शुभकामनाएँ

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🌿
षट्तिला एकादशी के पावन अवसर पर
तिल के दान और श्रीहरि के स्मरण से
आपके जीवन के पाप और कष्ट दूर हों।
मन पवित्र हो और घर में शांति का वास हो।
षट्तिला एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएँ!
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🪔
आज का यह पुण्य व्रत
दान, संयम और भक्ति का संदेश देता है।
भगवान विष्णु की कृपा से
आपके जीवन में सुख, संतुलन और सद्बुद्धि बनी रहे।
षट्तिला एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएँ!
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🌸
षट्तिला एकादशी का पुण्य
मन को शुद्ध करे और कर्मों को पवित्र बनाए।
श्रीहरि विष्णु का आशीर्वाद
आपके हर दिन को मंगलमय बनाए।
षट्तिला एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएँ!
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🌿
तिल के दान से मिले पुण्य से
जीवन की नकारात्मकता दूर हो।
भगवान विष्णु की कृपा से
आपके घर-परिवार में सुख और संतोष बना रहे।
षट्तिला एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएँ!
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💫
षट्तिला एकादशी का यह पावन दिन
आपके जीवन में संयम, श्रद्धा और भक्ति बढ़ाए।
श्रीहरि विष्णु का संरक्षण
सदैव आपके साथ बना रहे।
षट्तिला एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएँ!